इनकम टैक्स रिटर्न भरते समय एंप्लॉयर से मिले फॉर्म 16 से ही काम नहीं बनेगा

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लगभग सभी टैक्सपेयर्स को अदर सोर्सेज से इनकम होती है, लेकिन कुछ ही इसकी जानकारी टैक्स रिटर्न में देते हैं। यहां हम आपको बता रहे हैं कि इस तरह की इनकम की जानकारी कैसे दी जानी चाहिए। हम यहां बता रहे हैं कि कैपिटल गेन्स, हाउस प्रॉपर्टी से रेंट और इंटरेस्ट इनकम की गणना किस तरह की जानी चाहिए और आईटी रिटर्न में इनकी जानकारी किस तरह देनी चाहिए।इनकम टैक्स रिटर्न भरते समय एंप्लॉयर से मिले फॉर्म 16 से ही काम नहीं बनेगा। इसके अलावा कई डॉक्युमेंट्स की जरूरत पड़ेगी। कैपिटल ऐसेट्स बेचने से हुई इनकम, हाउस प्रॉपर्टी और डिपॉजिट पर ब्याज की जानकारी आईटीआर फॉर्म में देनी होती है। इन स्रोतों से हुई आमदनी छिपाने या इनकी गलत जानकारी देने से टैक्स नोटिस मिलने का पक्का इंतजाम हुआ समझिए। ऑनलाइन टैक्स फाइलिंग और प्लैनिंग सर्विस टैक्सस्पैनरडॉटकॉम के सीएफओ और फाउंडर सुधीर कौशिक ने कहा, ‘टैक्स अथॉरिटीज ऐसे लोगों पर घेरा कस रही हैं, जो टैक्स नियमों का उल्लंघन करते हैं। टैक्सपेयर्स को यह जानना चाहिए कि अधिकतर रेजिडुअल इनकम टैक्सेबल होती है और इनकी गलत जानकारी देकर बचा नहीं जा सकता है।’

इन्वेस्टमेंट्स से होने वाली काफी आमदनी टैक्स फ्री है, लेकिन इसकी जानकारी भी आईटीआर में देनी होती है। उदाहरण के लिए, सेविंग्स बैंक अकाउंट में 10000 रुपये तक का ब्याज टैक्स फ्री होता है, लेकिन इससे कम ब्याज मिला हो तो भी उसकी जानकारी ‘इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज’ के तहत देना जरूरी होता है। मच्योरिटी के समय पब्लिक प्रॉविडेंट फंड से मिला ब्याज और बॉन्ड्स से रिटर्न टैक्स छूट के दायरे में आते हैं, लेकिन शेड्यूल EI (एग्जेम्प्ट इनकम) के तहत इनकी अलग से जानकारी देनी चाहिए।म्यूचुअल फंड्स, स्टॉक्स, गोल्ड और अचल संपत्ति (मकान या जमीन) जैसी कैपिटल ऐसेट्स की बिक्री से होने वाला प्रॉफिट कैपिटल गेंस कहलाता है। टैक्सपेयर्स को इसकी जानकारी आईटीआर फॉर्म के शेड्यूल CG में देनी होती है। क्लियरटैक्सडॉटइन के फाउंडर और सीईओ अर्चित गुप्ता ने कहा, ‘जिन टैक्सपेयर्स की टैक्सेबल इनकम न हो, लेकिन उन्होंने बेसिक एग्जेम्पशन लिमिट से ज्यादा लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स हासिल किया हो, उन्हें इनकम टैक्स रिटर्न जरूर भरना चाहिए।’

कैपिटल गेन्स की गणना ऐसेट की परचेज प्राइस से इसकी सेल वैल्यू घटाकर की जाती है। हालांकि अलग-अलग ऐसेट्स के मामले में तरीका अलग होता है। विभिन्न ऐसेट्स से कैपिटल गेन्स पर टैक्स रेट्स इस पर निर्भर करते हैं कि गेन शॉर्ट टर्म है या लॉन्ग टर्म। मिनिमम होल्डिंग पीरियड से ज्यादा अवधि तक होल्ड करने पर हुए गेन्स को लॉन्ग टर्म कहा जाता है।

प्रॉपर्टी बेचने पर मिले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स पर इंडेक्सेशन बेनिफिट मिलता है। खरीद की इंडेक्स्ड कॉस्ट की गणना के लिए परचेज प्राइस का गुणा उस साल के कॉस्ट इन्फ्लेशन इंडेक्स (CII) से करें, जिस साल प्रॉपर्टी बेची गई हो। इसके बाद इसमें खरीदारी वाले साल के सीआईआई से भाग दें। हालांकि अगर बेची गई प्रॉपर्टी अप्रैल 2001 से पहले खरीदी गई हो तो आपको इंडेक्स्ड ऐक्विजिशन कॉस्ट की गणना के लिए 1 अप्रैल 2001 को प्रॉपर्टी की फेयर मार्केट वैल्यू पर ध्यान देना होगा।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि सही एफएमवी हासिल करने के लिए आप किसी रजिस्टर्ड वैल्यूअर से प्रॉपर्टी का वैल्यूएशन कराएं। चार्टर्ड अकाउंटेंट करण बत्रा ने कहा, ‘एक तरीका तो यह है कि 1 अप्रैल 2001 को रही स्टांप ड्यूटी वैल्यू को लिया जाए क्योंकि इस पर सवाल नहीं उठ सकता है। हालांकि स्टांप ड्यूटी वैल्यू से हो सकता है कि असल कॉस्ट का पता न चले तो बेहतर विकल्प यह है कि किसी इनकम टैक्स अप्रूव्ड वैल्यूअसर से वैल्यूएशन रिपोर्ट ले ली जाए, जिसमें फेयर मार्केट वैल्यू का सर्टिफिकेट होगा।’

अगर प्रॉपर्टी उत्तराधिकार में या तोहफे में मिली हो तो गेन्स की गणना के लिए प्रॉपर्टी हासिल होने की डेट वह होगी, जब मूल मालिक ने उस प्रॉपर्टी को खरीदा था। अशोक माहेश्वरी ऐंड असोसिएट्स एलएलपी के डायरेक्टर (टैक्स ऐंड रेग्युलेटरी) संदीप सहगल ने कहा, ‘ट्रांसफर डेट का होल्डिंग पीरियड और कैपिटल गेन्स की गणना से कोई संबंध नहीं होता है।’

मकान की साज-सज्जा से जुड़ा खर्च कैपिटल गेन्स की गणना के समय उसे खरीदने की लागत में जोड़ा जा सकता है। आपको इसके लिए कोई रसीद या दस्तावेज नहीं देना होता है, लेकिन यह ध्यान रखें कि हाउस इंप्रूवमेंट में कौन-से काम आ सकते हैं। गुप्ता ने कहा, ‘किसी भी कैपिटल ऐसेट की वैल्यू बढ़ाने पर किया गया खर्च इम्प्रूवमेंट कॉस्ट माना जाता है। प्रॉपर्टी के मामले में रेनोवेशन या जगह बढ़ाने के लिए स्ट्रक्चर में बदलाव पर खर्च के लिए डिडक्शन क्लेम किया जा सकता है। मेन्टिनेंस या रिपेयर कॉस्ट के लिए डिडक्शन क्लेम नहीं किया जा सकता है।’ एलटीसीजी के मामले में इंप्रूवमेंट कॉस्ट भी इंडेक्स्ड होनी चाहिए।

इसी तरह प्रॉपर्टी बेचने की प्रक्रिया से जुड़े खर्च को भी डिडक्शन के लिए ऐक्विजिशन कॉस्ट में जोड़ा जा सकता है। इस तरह के खर्च में ब्रोकरेज, स्टांप ड्यूटी, लीगल फीस, रजिस्ट्रेशन फीस आदि शामिल होती हैं। यह ध्यान रखें कि अचल संपत्ति बेचने से हुए कैपिटल गेन्स की जानकारी देते समय आपको बायर के नाम, पैन और पर्सेंटेज शेयर की जानकारी भी पते, रकम और प्रॉपर्टी के पिन कोड के साथ देनी होगी।

इस साल से शेयरों से होने वाले 1 लाख रुपये से अधिक के मुनाफे पर एलटीसीजी (लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स) देना पड़ेगा। 31 जनवरी 2018 तक शेयरों या इक्विटी फंडों पर लॉन्ग टर्म गेन पर ग्रैन्ड फादरिंग का नियम लागू है, इसलिए उस पर टैक्स नहीं देना होगा। इस शर्त की वजह से इक्विटी इन्वेस्टमेंट पर लॉन्ग टर्म गेन्स का मामला काफी उलझ गया है। 1 फरवरी 2018 से पहले खरीदे गए ऐसेट पर खरीद कीमत को वास्तविक परचेज प्राइस और एफएमवी से अधिक माना जाएगा। हालांकि अगर बेचे गए शेयर का एफएमवी सेल प्राइस से अधिक है तो बेचे जाने वाली कीमत को एफएमवी माना जाएगा। किसी शेयर के लिए 31 जनवरी 2018 को हाइएस्ट ट्रेडिंग प्राइस को एफएमवी माना जाएगा, जबकि म्यूचुअल फंड के लिए यह 31 जनवरी को एनएवी होगी।

आपको इसमें खरीद कीमत को लेकर खास सावधानी बरतनी होगी क्योंकि अगर आप गलत वैल्यू लेते हैं तो उससे गलत नेट कैपिटल गेन्स निकलेगा। अगर आपने कई शेयर बेचे हैं तो यह प्रक्रिया और पेचीदा हो जाती है क्योंकि फॉर्म में आपको हर ट्रांजैक्शन की अलग से जानकारी देने का विकल्प नहीं दिया गया है। गुप्ता ने बताया, ‘असेसी को हर स्टॉक पर कैपिटल गेन्स का अलग कैलकुलेशन करके नेट कैपिटल गेन्स का पता लगाना चाहिए। ऐग्रिगेट वैल्यू को इस तरह से डाला जाना चाहिए ताकि वह नेट कैपिटल गेन्स के अपने कैलकुलेशन से मैच करे।’ इसमें किसी तरह की गलती से बचने के लिए प्रफेशनल की मदद भी ली जा सकती है।

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