सरकार के सामने कई प्रकार की सब्सिडीज को वापस लेने की चुनौती है

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नई दिल्ली: देश के सबसे गरीब 25% परिवारों के हरेक सदस्य को न्यूनतम तयशुदा आय (मिनिमम गारंटीड इनकम) मुहैया कराने में सरकारी खजाने पर 7 लाख करोड़ का बोझ पड़ेगा। सरकार के प्रारंभिक अनुमानों में यह आंकड़ा सामने आया है। अकुशल कामगारों के लिए केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित प्रति दिन 321 रुपये की न्यूनतम मजदूरी को ही आधार बनाया जाए तो प्रति माह प्रति व्यक्ति 9,630 रुपये दिए जाने का प्रावधान लागू करना होगा। अगर सबसे गरीब 18 से 20 प्रतिशत परिवारों तक इस योजना को सीमित रखा जाए तो भी 5 लाख करोड़ से ज्यादा का खर्च आएगा। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भी पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा लोकसभा चुनाव में जीत मिलने पर मिनिमम इनकम गारंटी देने के ऐलान के बाद एक इंटरव्यू में यही कहा था। भारी-भरकम लागत
समाज के सबसे गरीब वर्ग को एक निश्चित रकम देने वाली योजना लागू करने की राह में इसकी भारी-भरकम लागत को ही रोड़ा माना जा रहा है। सरकार खाद्य से लेकर खाद (फूड टु फर्टिलाइजर) और कृषि से लेकर आवास ऋण (फार्म लोन टु होम लोन) तक तरह-तरह की सब्सिडी देती है।

2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में यूनिवर्सल बेसिक इनकम को लेकर दिए गए सुझावों में देश की सबसे गरीब 25 प्रतिशत परिवारों को सालाना 7,620 रुपये दिए जाने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन, इसकी लागत एवं कई प्रकार की सब्सिडीज को वापस लेने में सरकार की अक्षमता के मद्देनजर योजना को इतने विस्तृत दायरे में लागू नहीं किया जा सकता है।

योजना के कार्यान्वयन को लेकर एक बड़ी समस्या यह है कि आखिर लाभार्थियों की पहचान कैसे की जाएगी? हालांकि, पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन इसे बहुत मुश्किल नहीं मानते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि एक खास स्तर के ऊपर एसी, कार या बैंक बैलेंस वालों को योजना के दायरे में नहीं रखना चाहिए। सर्वेक्षण में योजना के लाभार्थियों की लिस्ट सार्वजनिक करने का सुझाव दिया गया था ताकि समाज का समृद्ध तबका लज्जित होने से बचने के लिए गलत तरीके से इस योजना का लाभ उठाने का प्रयास नहीं करे। साथ ही, इसमें लाभार्थियों को समय-समय पर खुद को योजना के उपयुक्त प्रमाणित करने का अधिकार दिए जाने का सुझाव दिया गया

 

सर्वेक्षण में इसकी लागत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.9 प्रतिशत बताई गई थी और कहा गया था कि 75 प्रतिशत गरीब आबादी को योजना के दायरे में लाने का सालाना खर्च 2.4 से 2.5 लाख करोड़ रुपये आएगा। सर्वे में देश के सबसे गरीब 25 प्रतिशत परिवारों में औसतन 5 सदस्यों को आधार बनाकर लागत का आकलन किया गया था। हालांकि, ऐसे 18 से 20 प्रतिशत परिवारों के ही हर सदस्य को 3,180 रुपये प्रति माह दिया जाए तो सरकार को सालाना 1.75 लाख करोड़ रुपये खर्च करने होंगे।

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