एक महान वीरांगना रानी दुर्गावती का इतिहास

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गोंडवाना| रानी दुर्गावती का जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के कलिंजर के किले में 5 अक्तूबर 1524 (संवत 1446, अश्विन सुदी अष्टमी) हुआ था। उनके पिता का नाम राजा कीरत राय (कीर्ति वर्मन) तथा माता का नाम कमलावती था। राजा कीरत राय कलिंजर के किले के अंतिम चंदेल राजा थे। जिस दिन उनका जन्म हुआ उस दिन दुर्गाष्टमी थी और पूरा महल दुर्गापूजा की खुशियाँ मना रहा था। दुर्गाष्टमी पर जन्म लेने के कारण उनके माता पिता ने उनका नाम दुर्गावती रखा। कन्या दुर्गावती बहुत ही सुंदर, सुशील और साहसी थी।
नौवीं शताब्दी तक मध्य प्रांत के संपूर्ण पूर्वी भाग और संबलपुर के एक बहुत बड़े क्षेत्र में गोंडों का साम्राज्य स्थापित हो गया था, जिसे गोंडवाना के नाम से जाना जाता था। इसमें आज के मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के कुछ हिस्से सम्मिलित थे गोंडवाना की रानी दुर्गावती ने अपने जीवन में 52 लड़ाइयां लड़ी। उन्होंने मियानां अफगानों को परास्त किया। रानी दुर्गावती ने मालवा के बाज बहादुर को 3 बार परास्त किया। यहां तक की रानी दुर्गावती ने अकबर के सेनापति आसफ़ खां को भी परास्त किया, परन्तु नराई नाले के युद्ध में उन्हें शत्रु सेना ने घेर लिया।
आंख में लगे तीर को रानी ने हाथ से निकाला, तो उसका नुकीला हिस्सा आंख में ही रह गया। एक तीर छाती में लगा और बेहोशी छाने लगी, तो उन्होंने आधारसिंह से कहा कि कटारी फ़ेंककर मुझे मार दो। आधारसिंह द्वारा ऐसा न करने पर रानी ने स्वयं ही कटारी निकालकर घोंप दी और वीरगति को प्राप्त हुईं।
रानी दुर्गावती ऐसी ही एक महान वीरांगना थीं जिनके कारण आज भी इतिहास में गोंडों का अस्तित्व बचा हुआ है। उनका बलिदान इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है, कि जहां ताकतवर मुगल साम्राज्य के आगे बड़े-बड़े राजा, महाराजा अपने आप झुक जाते थे और स्वेच्छा से समर्पण कर देते थे, वहीं रानी दुर्गावती ने मरते दम तक गोंडवाना की आन, बान और शान को बचाए रखा और मुगलों के आगे समर्पण नहीं किया।

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