वीलचेयर के सहारे दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रही गरिमा

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नई दिल्ली:जब तक मैं दौड़ के मैदान में मेडल जीत रही थी, सब मेरे साथ थे। आज जब मैं शरीर और पारिवारिक हालात दोनों से लाचार हूं, तब हौसला बढ़ाने वाली सरकार ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं यह कहना है उत्तराखंड की उड़नपरी गरिमा जोशी का। वह ऐथलीट हैं और राष्ट्रीय स्तर पर कई प्रतियोगिताओं में मेडल जीतकर राज्य का नाम रोशन कर चुकी हैं। हालांकि, बेंगलुरु में एक प्रतियोगिता में भाग लेने के दौरान हादसे का शिकार हो गईं और तब से वीलचेयर की मोहताज बन गई हैं। इस साल मई में जब मुझे 10 किलोमीटर की राष्ट्रीय स्तर की रेस में भाग लेने बेंगलुरु जाना था तब राज्य सरकार ने प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए 25 हजार रुपये की धनराशि दी थी। उस दौड़ में मैं छठे स्थान पर रही, लेकिन वहां मेरा ऐक्सिडेंट हो गया और दोनों पैर खराब हो गए।

स्पाइनल इंजरी के डॉक्टर गरिमा की फिजियोथेरेपी कर रहे हैं, लेकिन इतने लंबे समय से पैर ठीक नहीं होने की वजह से गरिमा वीलचेयर पर आ गईं। हालांकि अब वह वीलचेयर के सहारे धीरे-धीरे दौड़ने लगी हैं। यहां तक कि 21 अक्टूबर को उन्होंने नेहरू स्टेडियम में पहली बार वीलचेयर पर बैठकर दौड़ में हिस्सा लिया और जीत हासिल की। इसके बाद वह एक के बाद एक कई वीलचेयर रेस में शामिल हो चुकी हैं। गरिमा पर आफत सिर्फ एक तरफ से नहीं टूटी, उसके मां-बाप भी अच्छी हालत में नहीं हैं। गरिमा की मां फेफड़े के कैंसर की वजह से सफदरजंग अस्पताल में जिंदगी की अंतिम सांसें गिन रही हैं जबकि परिवार पर टूटी इस आपदा के बीच पिता की नौकरी भी चली गई है।

इलाज के दौरान उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत मुझे देखने बेंगलुरु के अस्पताल भी पहुंचे थे। वहां उन्होंने इलाज पर होने वाला पूरा खर्च उठाने का भरोसा दिया था। गरिमा बताती हैं, बाद में मेरा इलाज दिल्ली के स्पाइनल इंजरी सेंटर में होने लगा। इस दौरान राज्य सरकार ने इलाज के लिए 13 लाख 10 हजार रुपये दिए, लेकिन इलाज अभी चल ही रहा है। गरिमा ने बताया कि मेरे दोनों पैरों में हरकत नहीं है और शौच का अहसास भी नहीं आ रहा है, इसलिए यह इलाज लंबा चलेगा।हर तरफ से हालांकि लाचारी के इस दौर में भी गरिमा का हौसला बुलंद है। वह कहती हैं – जब तक मेरा पैर ठीक नहीं होता, मैं वीलचेयर के सहारे दौडूंगी। अस्पताल से निकलते ही मैं पैरालिंपिक की तैयारी शुरू करूंगी। बस दुख इस बात का है कि जिस सरकार ने मेरा इलाज का सारा खर्च उठाने की बात कही थी, उसने पैसा देने से मना कर दिया है। सरकार का कहना है कि अब तक तुम्हें सबसे ज्यादा पैसा दिया जा चुका है, अब और नहीं दे सकते। अब मैं अपने इलाज के लिए दोस्तों से मदद ले रही हूं, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी है। मैं देश के लिए पदक जीतकर रहूंगी।

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