चीन की भारी मौजूदगी US, फ्रांस को खटक रही

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इथियोपिया के रास्ते लाल सागर स्थित जिबूती की 10 घंटे की ट्रेन यात्रा के दौरान मोबाइल फोन के रिंग क्षेत्रीय भाषाओं और प्रार्थनाओं की आवाज में घुल जाते हैं। पीले रंग के फ्रॉक में एक महिला भारी कदमों से कॉफी और चाय बेचने आती है। पहली नजर में अदीस अबाबा से जिबूती के बीच रेल में चीनियों की मौजूदगी में खास बात नजर नहीं आती और तभी आपकी नजर चीनी ट्रेन ड्राइवर से लेकर कुछ चीनी यात्रियों पर जाती है।

चीनी कर्ज के बिना जिबूती का रेलवे स्टेशन अपने मौजूदा स्वरूप जैसा नहीं दिखता क्योंकि जिबूती की अर्थव्यवस्था चीनी कर्ज पर निर्भर है। वहीं, चीन की मौजूदगी अमेरिका और फ्रांस जैसे पश्चिमी देशों को खटक रही है और वे जिबूती को भविष्य के लिए आगाह कर रहे हैं।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, जिबूती का भू-रणनीतिक लोकेशन ही है जिस वजह से चीन ने इसमें इतनी रुचि दिखाई है। विश्वभर के करीब एक तिहाई जहाज स्वेज नहर, लाल सागर और हिंद महासागर की तरफ जाते और वहां से आने के क्रम में इस बंजर जमीन से होकर गुजरते हैं।

चीनी मौजूदगी के बारे में जिबूती के वित्त मंत्री कहते हैं, ‘यह सबकुछ ‘सी’ (चीन) के बारे में है।’ चीन की मौजूदगी इसकी आर्थिक रणनीति और विदेश नीति वाले ‘बेल्ट ऐंड रोड’ पहल का हिस्सा है, जिसमें चीन का काफी पैसा लगा है और जो वैश्विक गठबंधन को फिर से संतुलित करने के लिए तैयार किया गया है।

असल में इस नए सिल्क रोड सहित दर्जनों स्टेशनों को लेकर चीन और जिबूती के सहयोग ने पैरिस से लेकर वॉशिंगटन में हलचल पैदा कर दी है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शॉन्ग ने 18 मार्च को प्रेस ब्रीफिंग में कहा था, ‘चीन और अफ्रीका का सहयोग पूरे अफ्रीका में फलदायी नतीजे ला रहा है, यह स्थानीय लोगों की जिंदगी को हर तरफ से वास्तविक लाभ दे रहा है। यहां के लोग ही हैं जो चीन-अफ्रीका की साझा परियोजना के प्रभाव का बेहतर आकलन कर सकते हैं।’

रेलवे जिबूती की परियोजनाओं को जोड़ने का काम करेगा जिसमें चीन की सरकारी कंपनियों की काफी रुचि है। चाहे वह दोरालेह मल्टी-पर्पस पोर्ट हो या दोरालेह कंटेनर टर्मिनल या जिबूती इंटरनैशनल इंडस्ट्रियल पार्क ऑपरेशन, ये सभी विस्तार लेने वाले विनिर्माण केंद्र हैं। जिबूती के इंटरनैशनल इंडस्ट्रियल पार्क्स ऑपरेशन में ऑफिस टावर, होटल और गोदामों की संख्या बढ़ रही है। यह फ्री ट्रेड जोन कमर्शल ऑपरेशन जैसे दोरालेह कंटेनर टर्मिनल और दोरालेह बहुद्देशीय बंदरगाह के पास मौजूद है। वहीं, अगर जिबूती की अर्थव्यवस्था की बात करें तो इसकी जीडीपी 2017 में 1.85 अरब डॉलर थी। देश की जनसंख्या करीब 10 लाख है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के अनुसार, जिबूती की 79 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी में गुजर-बसर कर रही है और 42 प्रतिशत जनसंख्या बेहद गरीब है। देश की एक तिहाई जनसंख्या का जीवनयापन मवेशियों पर निर्भर है और देश को अपने भोजन का 90 फीसदी हिस्सा आयात करना पड़ता है।

चीन की जिबूती की कुछ परियोजनाओं में बड़ी हिस्सेदारी है। जिबूती कर्ज के जाल में फंसता जा रहा है और उस पर चीन की पकड़ मजबूत होती जा रही है। जिबूती में सिर्फ चीनी सेना की ही मौजूदगी है। यूएस-अफ्रीका कमांड का हेड क्वॉर्टर कैम्प लेमोनियर में है, जो अफ्रीका में अमेरिका का एक मात्र स्थायी बेस है। जापान, इटली और स्पेन के बेस भी यहीं मौजूद हैं। सऊदी अरब अपना बेस बनाने की सोच रहा है। फ्रांस की मौजूदगी 1894 से है क्योंकि अभी का जिबूती कभी फ्रेंच सोमालीलैंड कहलाता था जो कि 1977 तक फ्रांस का उपनिवेश था।

गौरतलब है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने जब मार्च में यात्रा की थी, उन्होंने पूर्वी अफ्रीका में फ्रांस की मौजूदगी बढ़ाने पर जोर दिया था। उन्होंने जिबूती को चीन पर बहुत अधिक भरोसा करने पर झिड़का था। उन्होंने कहा था कि जो छोटे समय के लिए अच्छा दिखता है, मध्यम और दीर्घ अवधि के लिए बुरा हो सकता है। वहीं अमेरिका, फ्रांस से ज्यादा हुंकार भर रहा है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बॉल्टन ने कहा, ‘चीन रिश्वत का सहारा लेता है, अस्पष्ट समझौता करता है और अपनी इच्छा और मांग पूरी करने के लिए अफ्रीकी देशों को बंधक बनाने के लिए कर्ज का रणनीतिक इस्तेमाल करता है।’ बॉल्टन ने जिबूती को भविष्य के परिणाम को लेकर आगाह किया क्योंकि ऐसी खबर थी कि चीनी व्यापारी हिस्सेदारी के बदले कर्ज के जरिए दोरालेह कंटेनर टर्मिलन पर नियंत्रण स्थापित करने वाले हैं।

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